आखिर जवाबदेह कौन ?

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भारत एक ऐसा देश जिसकी संज्ञा मातृदेश के रूप में है लेकिन देश पुरुष प्रधान कहलाता है. भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति हमेशा से ही सोचनीय रही है. समय के साथ हुए सामाजिक सुधारों से महिलाओं की स्थिति में काफी सुथार तो हुआ लेकिन आज भी पुरूषवादी सोच की वजह से महिलाओं के सामने तमाम समस्याएं हैं जिसकी जवाबदेही से पुरूषवर्ग बच नहीं सकता.

आज महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा से लेकर जघन्य अपराध देखने को मिलते हैं. अगर समाचार पत्रों की खबरों पर ध्यान दें तो तमाम खबरें महिलाओं की स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगाते दिखाई पड़ती हैं. सरकार एक तरफ जहां बेटी पढाओ-बेटी बचाओ का नारा देकर बेटियों की स्वतत्रंता की वकालत करती है तो वहीं दूसरी तरफ बेटियों के साथ हो रहे अपराध सरकार की वकालत पर बहस करती नजर आती हैं.इसे समाज की विडम्बना ही कहा जाएगा कि जहां एक ओर हम कल्पना चावला, पी.वी. सिन्धु, सानिया नेहवाल, मानुषि छिल्लर जैसी बेटियों  पर गर्व करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ निर्भया, लक्ष्मी, दामिनी जैसे मामले हमारा सिर नीचा कर देती हैं.

समझना मुश्किल होता है कि कोई इंसान इतना क्रूर कैसे हो सकता है जो अपने स्वार्थ और अंहकार के लिए किसी की स्मिता को इस कदर चोट पहुंचा सकता है जिसके जख्म की भरपाई करना शायद मुश्किल हो जाता है. क्या ये कतिपय पुरुषों का अहंकार और गुरुर है जहां महिलाओं की मनोस्थिति और उनकी आजादी का कोई मायने नहीं ? सामाजिकता के साथ यदि बात घरों में महिलाओं की स्थिति की करें तो आए दिन घरेलू हिंसा से पीड़ित होकर महिलाएं आत्मदाह करने को मजबूर हैं ?

एक रिपोर्ट की मानें तो भारत में हर 5 मिनट पर घरेलू हिंसा की एक घटना दर्ज की जाती है और ना जाने कितनी ऐसी घटनाएं है जो सामने ही नहीं आ पाती हैं. अगर सुरक्षा की बात की जाए तो महिलाओं की सुरक्षा भी एक बड़ी समस्या के रूप में है. बिना किसी डर या भय के रात के समय सड़क पर अकेले चलना मुश्किल हो जाता है आखिर ऐसा क्यों? क्या हम महिलाओं को रात में आने जाने या घूमने फिरने की आजादी नहीं? आखिर ऐसे तमाम सवालों की जवाबदेही किसकी है? हमारे समाज की या फिर हमारे सोच की?

मन में ढेरों सारे सवाल हैं लेकिन जवाब किसी भी सवाल का नहीं. पीड़ा है,दर्द है और बेचैनी भी कि इस बदलते देश में हम महिलाओं की स्थिति कब बदलेगी? क्या हमारे साथ होने वाली घटनाएं महज अखबार का वो हिस्सा बनकर रह जाएंगी जो दूसरे दिन रद्दी में बदल जाती हैं? एक महिला के साथ घटने वाली घटनाओं के लिए भी हम महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है. यदि महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं के लिए एक महिला जिम्मेदार है तो 10 दिन की नवजात बच्ची के साथ होने वाले बलात्कार के लिए जिम्मेदार कौन है? अगर देश को वाकई बदलना है तो सबसे पहले पुरूषवादी सोच को बदलना होगा. तभी पढ़ पाएंगी बेटियां और बढ़ पाएंगी बेटियां......

लेखिका-अर्पिता रॉय,

इंजीनियरिग छात्रा

(ये लेखिका के अपने निजी विचार हैं।)